Saturday, 29 September 2012

khawabo ke shahensha


  शेर और मर्द न तो बदसूरत होता और न बूढ़ा...
शिखा श्रीवास्तव
अरे यार! पता है आज मार्केट से आते समय क्या हुआ? थोड़ा सा चिढ़चिढ़ाते हुए आयुषी ने मीनाक्षी से कहा। क्या हुआ इतनी चिढ़ कर क्यों बोल रही हो, किसी ने कुछ कह दिया क्या चुटकी लेते हुए मीनाक्षी ने पूछा। पक्का किसी लड़के ने छेड़ा होगा तुझे है न! तू अपना मुंह बंद रखेगी कि नहीं तब तो मैं कुछ बताऊं  गुस्साते हुए आयुषी बोली। चल ठीक है पता क्या हुआ। आयुषी बोली, तुझे तो पता ही था आॅफिस के बाद मुझे मार्केट जाना था। सो मैं सिविल लाइंस चली गई पहले सोचा था कि आॅफिस से सोना को ले लूंगी, लेकिन उसे किसी काम से घर जल्दी जाना था इस वजह से वह मेरे साथ आ न सकी। खैर मैं छह बजे आॅफिस से निकली और मार्केट पहुंची।
वहां से शॉपिंग कर जब मैं मार्केट से बाहर निकल रही थी, अचानक ऐसे लगा कि कोई मेरा पीछा कर रहा है। मैं पीछे की तरफ मुड़ी तो एक अंकल थे जिनकी उम्र करीब 55 के आस-पास होगी। मुझे लगा ये तो बूढ़े हैं, ये मेरा पीछा क्यों करेंगे। वैसे वे अच्छे परिवार और एजुकेटेड लग रहे थे। मुझे लगा कोई और लड़का होगा जो मेरे पीछे की तरफ पलटते ही छिप गया होगा। खैर मैं तेजी से आटो स्टैंड की तरफ बढ़ी और आटो में बैठ गई। अचानक मेरी नजर उन्हीं अंकल पर पड़ी, खैर मुझे इससे क्या? लेकिन शायद वे समझ गए थे कि मेरे मन में यही ख्याल आया था कि इन्हें तो मैंने मार्केट में देखा था। 10 मिनट के बाद आटो चला। थोड़ी देर बाद मुझे ऐसा लगा कि कोई चीज मेरी पीठ पर चल रही है, फिर उसी क्षण यह भी ख्याल आया अरे मेरी तो आदत हैं बेवजह सनके की।  सो मैं चुप बैठ गई, लेकिन कुछ देर बाद फिर से मुझे ऐसा लगा कि कोई मेरी पीठ पर अपने हाथ को धीरे-धीरे चला रहा है।
थोड़ा सा डरते हुए और खुद को सजग करते हुए मैं सीट से थोड़ा आगे की तरफ खिसक गई, ताकि जो भी हो उसका हाथ मुझ तक न आ सके। बहुत तेज से गुस्सा आ रहा था मुझे, क्योंकि मुझे लगा कि मेरे बगल में जो लड़का बैठा वहीं बदमीजी कर रहा है। इसके पहले कि मैं उससे कुछ कहती, मैंने देखा कि उसने अपने दोनों हाथों से आटो में आगे की ओर लगी छड़ी को पकड़ कर रखा है। फिर मुझे लगा ये नहीं है तो कौन है? अंधेरे में न तो कुछ समझ आ रहा था और न ये समझ आ रहा था ये नहीं है तो कौन है, क्योंकि पीछे की सीट में केवल मैं ही लड़की थी और अंकल के अलावा दो लड़के। अंकल के बारे में मेरे मन में एक बार भी खयाल नहीं आया। इसी उधेड़बुन में थी कि मेरी नजर अंकल पर पड़ी। मैंने देखा कि  उन्होंने अपना पीछे वाला हाथ मेरी पीठ पर रखा हुआ था। एक तो अंधेरा दूसरा उनकी उम्र की वजह से मेरे मन में एक बार भी उनके बारे में खयाल नहीं आया था , कि ऐसी गिरी हुई हरकत वो कर सकते हैं। लेकिन उनका हाथ अपने पीठ पर देखते ही मैंने गुस्साते हुए बोला, अंकल आप सही से बैठिए। अनजान बनते हुए वह बोले, क्या हुआ बेटा मैं तो सही से बैठा हूं। आप सही से नहीं बैठे हैं तभी मैं कह रही हूं, अपनी उम्र का कुछ तो लिहाज करें आग उगलते हुए सारी भड़ास मैंने निकाल दी। कैसी बात करती हो बेटा,मैं तुम्हारे पिता की उम्र का हूं  और मेरी भी बेटी है मैं ऐसा क्यों करूंगा? कुछ तो सोच कर बोला करो। अंकल मैं ऐसी नहीं बोल रही हूं , पूरे रास्ते आपने मुझे परेशान किया है। ज्यादा करेंगे तो मैं अभी पब्लिक और पुलिस को बुलाऊंगी।
अच्छा तो ये बात थी, मीनाक्षी ने गहरी सांस लेते हुए बोला। एक बात और आयुषी बीच में ही उसकी बात काटते हुए बोली। क्या ? फिर क्या किया उस बूढ़े खुसठ ने, मीनाक्षी को भी उस सो कॉल्ड अंकल पर गुस्सा आ चुका था। आटो वाले को जब मैं पैसे दे रही तो वह भी उतर पड़े और जाते-जाते वह अंकल बोले कि  मर्द और शेर कभी बूढ़े नहीं होते, वह ताउम्र जवान रहता है। मेरे बारे में सोचना जरूर कल फिर मिलूंगा।
यार मुझे बहुत गुस्सा आ रहा है,समझ नहीं आ रहा है मैंने उस अंकल क्यों छोड़ दिया दो थप्पड़ रसीद करने चाहिए थे,उन्हें अपनी उम्र तो याद आ ही जाती। अरे आयुषी, तू अपना खून क्यों जला रही है? इससे कुछ नहीं होने वाला है सभी आदमियों की सोच एक सी होती है उनको यही लगता है कि  वह न तो कभी बूढ़े होते हैं और न ही बदसूरत होते हैं। इनकी सोच नहीं बदली जा सकती।
मीनाक्षी का कहना बिल्कुल सही है पुरूष प्रधान समाज में वह यह कभी नहीं बर्दाश्त कर सकते कि कोई लड़की यह कहें कि आप बूढ़े हो चुके हैं या फिर वह देखने में अच्छा नहीं है। लड़का चाहे कितना ही खराब हो फिर चाहे वह उसकी शिक्षा, व्यवहार या रंग-रूप किसी भी मामले में लड़की से पीछे हो उन्हें लड़की विश्वसुंदरी ही चाहिए। जो लड़कियां देखने सुनने में कम अच्छी होती हैं, उनके लिए तो ऐसे गंदे शब्द यूज करते हैं कि जैसे भगवान ने बहुत बड़ी गलती कर दी है उसे इस दुनिया में भेजकर। यह बात सही है कि सामाजिक बदलाव के साथ लड़को की सोच थोड़ा सा बदली है, लेकिन जब मैरिज की बात आती है तो ज्यादातर इस बात पर रिश्ता तय करने से मना कर देते हैं कि फलां लड़की की हाइट कम है, कि उसकी नाक अच्छी नहीं है, बहुत मोटी है या उसके शरीर में कुछ है ही नहीं। कई बार तो अपने फैं्रड्स को फोटो दिखाते हैं और पूछते हैं बता, तेरी भाभी बनने लायक है या नहीं।
अभी   हाल की बात है मेरी फ्रेंड संयोगिता का भाई राघव जो देखने में कोई खास नहीं था, हां थोड़ा सा बातचीत में लग रहा था कि ठीक है। उसकी शादी की बात चल रही थी, मेरी फ्रेंड ने उसे कुछ फोटो दिखाई। देख! भाई, मां ने तेरे लिए कुछ फोटो भेजी हैं इनमें से जो लड़की तुझे पसंद हो बता। बड़े ही उत्सकता से फोटो देखी और चिढ़चिढ़ाते हुए बोला क्या दीदी मां को कोई और लड़की नहीं मिली। यह भी कोई लड़की एक तो सांवली , ऊपर से इसके होंठ देखिए कितने मोटे हैं। मैं इससे शादी करूंगा, किसी कीमत पर नहीं। संयोगिता ने जैसे ही यह बात सुनी गुस्साते हुए बोली तू ही कौन सा कोहिनूर है जो तेरे लिए  हूर की परी के रिश्ते आएंगे। पहले तू अपनी शक्ल देख बात में लड़कियों की बात कर मेरे से। यह सुनते ही राघव लाल-पीला हो गया। देखो दीदी आप मेरे से बड़ी हो इसका मतलब यह नहीं है कि आप मेरा मजाक उड़ाए। वैसे भी यह कहां लिखा है कि लड़के देखने में खराब होते हैं। वह चाहे जैसे हो हमेशा जवान और बढ़िया होते हैं। लड़कियां की उम्र और सुंदरता जरूर मायने रखती है। आखिर हम लड़को के शान की बात जो होती है। मैं तो खूबसूरत लड़की से ही शादी करूंगा, ताकि लोग कहें कि राघव की बीवी है।
यह हैं पुरूष प्रधार समाज की असली कहानी जो खुद को कभी भी बूढ़ा और बदसूरत नहीं मानते। अगर आपने कह दिया कि आप बूढ़े हो या किसी लड़के से कह दो कि तुम देखने में बिल्कुल अच्छे नहीं लगते हो। तुमसे कोई सुंदर लड़की शादी नहीं करेगी। समझो उसके सबसे बड़े दुश्मन आप ही होगे। यह ऐसी सोच है जो पुरूष के दिमाग में हमेशा हावी रहेगी क्योंकि शेर और मर्द न तो बूढ़े होते हैं और न बदसूरत....

Friday, 20 July 2012

AADHI DUNIA KI DURDASA....


आंचल में है दूध, आंखों में पानी...
शिखा श्रीवास्तव
मुझे नहीं पता है कि मैं क्या करूं? क्या कहूं, या  लिखूं  इधर चार-पांच दिन से जिस तरह से एक के बाद एक महिलाओं और लड़कियों की इज्जत और उनकी आजादी के साथ खिलवाड़ किया जा रहा, उसे पढ़ और देखकर कभी-कभी आत्मा फटने लगती है। कि क्या हो रहा है समाज में। सारी संवेदनाएं और इंसानियत जैसे सब शून्य हो गई हों। दुनिया के सारे नियम- कायदें, बंदिशें और शोषण केवल महिलाओं के लिए ही हैं। जब भी किसी  पुरुष के दिमाग में हैवानियत शुरु होती है, अपना काम किया और बढ़ गया आगे।
जिस देश में यह कहा जाता है कि-
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते- रमन्ते तत्र देवता यानि जहां नारी की पूजा होती है, वहां देवता बसते हैं।
वहां महिलाओं की ऐसी दुर्दशा देख शर्म आती है। कितनी शर्मिंदगी की बात है कि जिस कोख से यह दुनिया चलती है, उसी के नुमांइदे  उन्हीं के स्वरूप को बेइज्जत कर रहे हंै। जब महिला और पुरुष दोनों बराबर हैं, तो उनके साथ यह अभद्र व्यवहार क्यो?
हाल ही कुछ घटनाएं यह सोचने पर मजबूर कर देती हैं कि क्या वाकई में लड़कियां और महिलाएं ही इस तरह की घिनौनी हरकतों के लिए उकसाती है क्योंकि हर बात के लिए उन्हें ही दोषी ठहराया जाता है। कितना गंदा खेल सरेराह आम लोगों के बीच हो रहा है और न कोई विरोध करने वाला है और न कोई सुनने वाला है। यह सही नहीं हो रहा है, क्योंकि जब किसी की चीज की अति हो जाती है तो, उसका सर्वनाश होना तय है। भले ही यह कलियुग है लेकिन अति हर चीज की बुरी होती है। ऐसी घटनाओं को सब ऐसे देखते हैं जैसे कि कोई नौटंकी या मेला लगा हुआ है। कुछ लोग हाल की घटनाओं को सुन या देख कर अफसोस जता रहे हैं, कुछ लड़कियों को कोस रहे हैं तो कुछ यह कह कर शांत हो जा रहे है कि इसमें कौन सी बड़ी बात है, यह कह लग गए अपने- अपने काम पर। हो गया हमारी सभ्य सोसायटी का काम पूरा।
गुवाहटी में एक पंद्रह साल की लड़की को 20 लड़के सरेराह न्यूड करने की कोशिश करते हैं, लेकिन कोई कुछ नहीं कहता आखिर कौन सी अपनी बेटी या बहन या परिवार की है जो पचड़े में पड़े। कुछ को खड़े होकर तमाश देखने में मचा आ रहा था, सो खड़े हो गए और कुछ जरूरत से ज्यादा शरीफ थे इसलिए बिना रूके चुपचाप अपने-अपने रास्ते चले गए। समझ नहीं आता आखिर क्या समझ रखा है लड़कियों को केवल उपभोग की वस्तु। ऐसे ही कोच्चि में 23 साल की लड़की अपनी शादी की बात कर घर से वापस आ रही थी, वहां तमिलनाडु के गोविंदास्वामी (जैसा न्यूज में बताया गया) ने पहले उससे ट्रेन में ही छेड़खानी करने की कोशिश की, सफल नहीं हुआ तो लड़की को ट्रेन से धक्का देकर पटरियों पर ही रेप कर दिया। जहां पांच दिन एक हॉस्पिटल में जिंदगी और मौत से जूझने के बाद रविवार को उसने दम तोड़ दिया। एक और घटना में बरेली के सुभाषनगर में घर में लड़की को अकेला पाकर उसके साथ गैंगरेप की कोशिश की गई। विरोध करने पर उसे बेल्ट से पीटा और उसके कपड़े फाड़ दिए। खुद की इज्जत बचाने के लिए उसे न्यूड होकर ही भागना पड़ा। हाल ही में एक बागपत की खाप पंचायत ने एक तालिबानी फरमान दिया है कि 40 साल से कम उम्र की महिलाएं और युवतियां मार्केट नहीं जाएंगी, मोबाइल फोन नहीं यूज करेंगी। ताकि उनके साथ छेड़खानी आदि घटनाएं न हो सकें। महिलाओं को इस तरह घर में कैद कर क्या खाप पंचायत इस  बात की गांरटी लेती है कि वह घर में सुरक्षित में है। क्योंकि उनके साथ रेप, छेड़छाड़, शारीरिक शोषण घर पर भी हुआ है। स्वतंत्र देश में इस तरह का तालिबानी फरमान सही नहीं है। फिर अगर सारे फैसलें पंचायत को ही करने हैं, तो सरकार और ज्यूडिसरी किस लिए है?
मैं ऐसा नहीं कह रही हूं कि सभी पुरूष एक जैसे हैं, लेकिन अगर आप शांत रह कर अपराध का साथ देते हैं, तो आप भी उतने ही दोषी हैं जितने की वो जो महिलाओं की इज्जत को खिलौना समझ रहे हैं।
हमारे समाज के कुछ सभ्य लोगों का मानना है कि वेस्टर्न डेÑसेज के कारण ऐसा होता है, तो ऐसा कहने वाले जरा यह बताएं कि जब एक 80 साल की बुजुर्ग महिला जो जिंदगी के आखिरी पड़ाव पर आ चुकी है उसके साथ ऐसी घटनाएं क्यों हो जाती हैं? वह तो वेस्टर्न कपड़े नहीं पहनती है। दो साल की बच्ची जो अपने मां-बाप को भी सही से नहीं पहचानती उसे भी आप दोषी ठहरा दें। लेकिन कभी उन पर आरोप न लगाएं, जो ऐसे कुकृत्यों को अंजाम देते हैं।
नेशनल क्राइम रिपोर्ट पर नजर डालें तो रूह कंपा देने वाले आंकड़े सामने आते हैं। 2006 में 1,64, 765 अपराध हुए, जो 2010 में बढ़कर 2, 13, 585 हो गए। वहीं 2010 में रेप
22, 172 , किडनैप 29,795, दहेज हत्या के 8,391 केस, टार्चर के 94,041, छेड़छाड़ के 40,9, 678
, यौन शोषण के 9, 961, लड़कियों को इंपोर्ट करने के 36, तस्करी के 24, 999 अनुचित प्रदर्शन के 8 और दहेज निषेध अधिनियम के तहत 5, 182 मुकदमें दायर हुए। भले ही नेशनल क्राइम रिपोर्ट के आंकड़े दिल दहलाने वाले हो, लेकिन अभी भी इससे दोगुने अपराध ऐसे हैं जिनकी जानकारी ही नहीं हो पाती है। सोचिए अगर सभी अपराधों का ब्योरा मिल जाए तो आंकड़े कहां पहुंच जाएंगे। दस में दो अपराध के बारे में पुलिस को खबर रहती है, बाकी का कुछ पता नहीं। वैसे भी जिनका पता चलता है उन्हीं की तह तक पुलिस नहीं पहुंच पाती है। यह भी एक शर्म की बात है कि जितनी तेजी से अपराध बढ़ रहे हैं, उतनी ही तेजी से पुलिसिया कार्रवाई का ग्राफ गिर रहा है।
कभी-कभी कुछ लोग ऐसी घटनाओं के लिए किसी खास समूह या वर्ग पर आरोप लगाने लगते हैं, जो गलत है। इस तरह की दरिंदगी और दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं के लिए न कोई धर्म, जाति या वर्ग जिम्मेदार नहीं होता। जिम्मेदार है तो कुछ पुरुषों की विकृत मानसिकता जिन्हें यह लगता है कि  महिलाएं सिर्फ गुलाम हैं और उनके साथ किसी भी तरह का घिनौना काम करना सही है, क्योंकि आप पुरुष हैं। अगर नियम और बंदिशें महिलाएं के लिए हैं तो पुरुषों के लिए कोई नियम क्यों नहीं लागू होता है।
कुछ महानुभाव का कहना है कि जो चीज खूबसूरत या उपभोग की है उसके साथ तो ऐसा होगा ही। एक बात बताएं जरा क्या बात आप अपनी मां,बहन, बेटी या पत्नी के लिए भी कहेंगे। घिन आती है ऐसी पढ़ी-लिखी सोसाइटी की ऐसी नीच सोच पर। कुछ कहते हैं कि पुलिस के पास जाना चाहिए, तो शायद आपको पता ही होगा कि हमारे देश की पुलिस कितनी अच्छी है रेप हो जाता है, अपराधी भाग जाता है तब पहुंचती है पुलिस। पहुंचने के बाद भी बेतुके सवाल। और मौका मिला तो वह भी हाथ साफ करना नहीं भूलते। ऐसे में कौन लड़की जाएगी पुलिस स्टेशन शिकायत करने।
सरकार और नेता दोनो एक ही चट्टे-बट्टे के हैं। केवल देश को लूटना है, किसी महिला की आबरू से उसका कोई लेना देना नहीं है। जो हो रहा है होने दो, न देश की इज्जत से कुछ लेना देना न यहां की महिलाओं से। कानून बनाएं भी हैं तो ऐसे कि जितनी देर में फैसला होगा उतने देर में कई बार उस पीड़ित महिला का बलात्कार हो चुका होगा। हैवानियत का ऐसा खेल होता रहा, तो महिलाओं को अपने लिए खुद ही अकेले कुछ करना पडेÞगा। फिर उसका परिणाम कुछ भी हो।
मैथिली शरण गुप्त ने महिलाओं को व्यथा को बहुत पहले ही बयां कर दिया था,जो बिल्कुल सही था।
अबला जीवन है तेरी यही कहानी,
आंचल में है दूध और आंखों में पानी।
आज यही हालत महिलाओं की हो गई है, 21 वीं सदी नाम की है जो हाल महिलाओं का आज से 100 साल पहले था वहीं अब है। जब तक महिलाओं को समानता और सम्मान की नजर से पुरुष नहीं देखेंगे तब तक ऐसा होता रहेगा। देवी की पूजा करते हैं, तो उनके स्वरुप का भी सम्मान करें।

Saturday, 30 June 2012

matlabi dunia





bhanaou se pare dunia

kahte hai halat insaan ko sab kuchh sikha dete h, lekin mere saath aisa nahi h.har bar mai logo k saath accha karti ye samajh kr ki vah bahut accha, saccha hai aur har bar mai dhokha khati hu. kabhi kabhi to lagta h kabhi kisi ki help hi nahi karni chahiye ya kahu ki kisi se jyada matlab nahi rakhna chahiye.jaisa ki is matlabi dunia m matlabi aur namm k riste hote h.aao jitna kisi ko accha samjhoge wo utna hi kharab hota h. mera anubhav to yahi kahta h. aaj ki dunia m koi accha nahi hota balki har koi aapki acchai aur sidhepan ka fayeda uthata h. mai ye nahi kah rahi ki koi accha nahi hota lekin ab tak maine jiske\i help ki ya jise saccha samjha wahi sabse bada farebi nikla. insaaniyat, bhavnaye sab kahtam ho chuka h ya kahe apne aaram ya khusio k liye ye jhoothe log ise badal dete h.filhal ab tak bahut hi badnasib rahi ki jise apna saccha sathi samjha mauka padne par usne mere hi pith pr chhur a ghopa.abhi maine nahi samjha to sayad kabhi nahi samjh paoungi. aaj k baad sirf utna hi bharosa rakhna h jitna mere liye jauri h, ek baat k liye god ko thanks bhi kahna chaungi ki usne meri life m kuchh aise logo ko bhi samil kiya jinhone har kadam par mera sathh diya fir bhi taklif hoti h jiske aap aansu poochte ho wahi aapki takli ka karan bane to kaisa lagega. khair sayad kismat ko yahi manjur h.fir bhi ab kisi bahri k aansu nahi pochh sakti .........

Thursday, 24 November 2011

सिर्फ लोकपाल कानून से नहीं जाएगा भ्रष्टाचार

भ्रष्टाचार भारतीय लोकतंत्र का एक असुविधाजनक तथ्य है। इस व्याधि के खिलाफ लगातार लड़ाई की जरूरत है। इसका अहसास तमाम राजनीतिक दलों, जनवादी संगठनों और नागरिक समाज के प्रबुद्ध वर्ग को है। इसे लोकतंत्र के लिए शुभ लक्षण कहा जा सकता है।लेकिन वर्तमान  समय मे भ्रष्टाचार उन्मूलन समय की मांग है और इसके लिए देश को सशक्त लोकपाल की जरूरत है। इसके साथ-साथ और भी कई कदम उठाने होंगे, जिनकी मदद से हम भ्रष्टाचार के खिलाफ कारगर जंग छेड़ सकते हैं। भारतीय समाज एक गतिशील समाज है। सत्ता और उपभोक्ता वर्ग के बीच कई लोग आते हैं, जिन्हें हम बिचौलिया कह सकते हैं। सार्वजनिक वितरण प्रणाली का सवाल हो या लोक सेवा से जुड़े सरोकार हों, इन्हें सही ढंग से हल करने की आवश्यकता है। अगर वाकई मे हम बदलाव चाहते है तो सबसे पहले युवाओ को आगे आना होगा,क्योकि जब देश मे बदलाव आया हमेशा से इस क्रांति की इबादत युवाओ द्वारा  ही लिखी गई है |
टेक्नोलॉजी से जाएंगे बिचौलिए
बिचौलिया संस्कृति पर अंकुश टेक्नोलॉजी की मदद से लग सकता है। आज हम इनकम टैक्स के लिए अप्लाई करते हैं तो जिसकी मदद से यह फॉर्म भरते हैं, वह उसका पैसा मांगता है। अगर यह प्रक्रिया पूरी तरह से ऑनलाइन हो जाए, जिसमें ऑनलाइन ही अप्लाई करें और रिफंड का पैसा सीधे खाते में आ जाए तो भ्रष्टाचार की संभावना कम होगी। इसी तरह पासपोर्ट भी अगर पूरी तरह से ऑनलाइन बनकर डाक विभाग के जरिए घर आने लगे तो बिचौलियों की जरूरत कहां होगी? इस तरह बिचौलिया संस्कृति समाप्त होने के साथ-साथ भ्रष्टाचार का तंत्र बिखर कर टूट जाएगा। टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करके बिचौलिए की की भूमिका शनै: शनै: खुद समाप्त हो जाएगी। इससे आम जनता को लाभ हो सकता है।
धन लोलुपता का जोर
भारत की प्राचीन सांस्कृतिक विरासत है। हमारे वंदनीय पूर्वजों ने चरित्र निर्माण के महत्व को रेखांकित किया था। राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्राम की स्फूर्तिदायिनी परंपराओं ने गांधी जी के नेतृत्व में ईमानदारी , सादगी , सत्यनिष्ठा और पारदर्शिता का पाठ पढ़ाया था। गांधी भक्त रोम्यां रोलां के शब्द लेकर कहा जाए तो गांधी केवल एक लफ्ज नहीं , बल्कि एक मिसाल है। वह अपने देशवासियों की आत्मा का प्रतीक हैं। गांधी जी ने जिस भ्रष्टाचार मुक्त भारत का सपना देखा था , नेहरू जी , इंदिरा जी और राजीव जी ने उस सपने को सच में बदलने में निर्णायक भूमिका अदा की थी। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और उनके सहकर्मी दृढ़ संकल्प के साथ भ्रष्टाचार मुक्त शासन / प्रशासन को विस्तृत आधार देना चाहते हैं। उपभोक्ता संस्कृति पश्चिम से आई है। धन लोलुपता ने हमारे नैतिक मूल्यों को झकझोर दिया है। जल्दी से जल्दी धन के अंबार अपने घर - आंगन में लगानेे की लालसा बढ़ी है। यह किसी व्यक्ति के पाप और पुण्य से जुड़ा सवाल नहीं है , बल्कि विकास की ऐतिहासिक उपज है। हमें इसमें बदलाव लाना होगा , लेकिन इसमें वक्त लग सकता है।

कई लोग कहते हैं कि भ्रष्टाचार हमारा राष्ट्रीय चरित्र बन चुका है , लेकिन मैं ऐसा नहीं मानता। भ्रष्टाचार के लिए अकेले चरित्र दोषी नहीं है। हमारे यहां मांग और आपूर्ति के बीच जो दूरी है , वह भी भ्रष्टाचार को बढ़ाती है। हम शिक्षा के क्षेत्र को ले सकते हैं। आज गुणवत्ता संपन्न शिक्षा संस्थान देश मंे मुट्ठीभर हैं , लेकिन इनमें दाखिले के लिए मारामारी है। लोग अच्छे कॉलेजों में पैसे देकर भी एडमिशन के लिए तैयार रहते हैं। इससे कदाचार को बल मिलता है। ऐसे में अगर इन दोनों के मिसमैच को खत्म कर दिया जाए तो भ्रष्टाचार को खत्म करने में मदद मिल सकती है। भ्रष्टाचार के उन्मूलन का सवाल देश और दुनिया में महत्वपूर्ण बना हुआ है। कोई एक तरीका अपनाने से भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा , मैं ऐसा नहीं मानता। भ्रष्टाचार खत्म करने के लिए आपको समानांतर चीजों का इस्तेमाल करना होगा। इस बिंदु पर , अनुरोध करूंगा कि जहां मजबूत कानून है , बिचौलिया व्यवस्था नहीं है , वहां भी कदाचार पूरी तरह से खत्म नहीं हुआ है। ऐसे में यह कहना कि लोकपाल के कानून से भ्रष्टाचार पूरी तरह खत्म हो जाएगा , सही नहीं होगा। लेकिन हां , देश में एक अच्छा और मजबूत कानून तो होना ही चाहिए।
भारत एक संसदीय गणतंत्र है। संविधान और संसद इसके दो आधारभूत अंग हैं। इसलिए लोकपाल संविधान सम्मत होना चाहिए। विधायिका , कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच शक्ति पृथक्करण जनतंत्र का मूल सिद्धांत है। इसी वजह से भारत संसार का सबसे बड़ा जनतंत्र बना हुआ है। कानून का शासन , स्वतंत्र न्यायपालिका और अभिव्यक्ति की आजादी ही जनतंत्र का बुनियादी सरोकार है। सत्ता पक्ष और प्रतिपक्ष के बीच संवाद के बल पर जनतंत्र चलता है। एक अच्छा कानून बनाने में संसद अपनी भूमिका अदा करती है और स्थायी समिति सभी पक्षों से विचार - विमर्श करती है। इसके बाद विधेयक तैयार होता है और सरकार इसे संसद में पेश करती है।


पहले से धारणा न बनाएं

सरकार संविधान और संसद की सर्वोच्चता पर भरोसा करती है। लेकिन लोकपाल बिल की बहस के दरमियान ऐसे अवसर भी देश ने देखे हैं , जब दुराग्रह का सहारा लेकर कुछ शक्तियों ने कहना शुरू किया था कि वे संविधान और संसद से ऊपर हैं और उनका हर वाक्य , ब्रह्मवाक्य है। यदि उसे नहीं माना गया तो वे सरकार का देशव्यापी विरोध करेंगे। यह उनका फैसला है। हर नागरिक किसी को वोट देने के लिए स्वतंत्र है। कांग्रेस सिर्फ अपना काम करेगी , अपना कर्तव्य निभाएगी और जब कर्तव्य पूरा हो जाएगा तो वह फिर जनता के बीच जाएगी। जनता फैसला करे। हमने कहा है कि अगले सत्र में हम न सिर्फ एक , बल्कि कई और विधेयक भी लाने वाले हैं। हम कहना चाहते हैं कि लोकपाल के मुद्दे पर उन्हें राष्ट्र के सामूहिक विवेक पर भरोसा रखना चाहिए , जिसका प्रतिनिधित्व संसद करती है। इस मुद्दे पर पहले से कोई धारणा तय कर लेना सही नहीं है। अन्ना जी ने जब कहा कि उनकी कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा नहीं है तो हमने उन पर भरोसा किया। उन्होंने जो मुद्दे उठाए हैं , उनका राजनीतिक कारणों से दुरुपयोग नहीं होने देना चाहिए। सत्य हमें रास्ता दिखाएगा और साहस हमारी रक्षा करेगा। हम जल्द ही अपनी मंजिल पर पहुंच जाएंगे।

छोटे तब क्षमा करें, जब बड़े करें उत्पात!

बचपन से सुनते आए हैं, क्षमा बड़न को चाहिए छोटन को उत्पात... पर लगता है समाज 180 डिग्री पर घूम गया है। मुंबई में एक 76 साल का बूढ़ा व्यक्ति नाबालिग लड़कियों की अश्लील सीडी बनाते हुए पकड़ा गया है। अहमदाबाद में कई बुजुर्गों को लिव-इन रिलेशनशिप के लिए पार्टनर मिल गए हैं। दोनों सामाजिक मान्यताओं को झकझोरने वाली घटनाएं हैं। हालांकि दोनों की आपस में तुलना नहीं हो सकती। पहला मामला, सभ्यता-संस्कार की धज्जियां उड़ाने वाले एक अकेले झक्की बीमार दिमाग की उपज है। इस तुलना में दूसरे मामले को शादी के बंधन के बाहर 'सुख' तलाशने की सामूहिक कोशिश का नाम देकर कुछ हद तक 'जस्टिफाई' किया जा सकता है। थोड़ी देर को इनसे जुड़ी नैतिकता के मूल सवाल को अलग रखते हुए बढ़ती हुई उम्र के उस साझा सूत्र पर विचार करते हैं, जो इन्हें जोड़ता है।

कहते हैं, बुढ़ापा अपने साथ कमजोरी और बीमारी लेकर आता है। बहुत सारी जिंदगियों में असुरक्षा और एकाकीपन भी। उम्र का ऐसा पड़ाव होता है, जहां नौकरी से रिटायरमेंट हो चुका होता है। बिजनेस हो तो, वह भी अपने से ज्यादा 'एफिशियंट' नई पीढ़ी ने संभाल लिया होता है। किसी को न आपकी जरूरत होती है और न ही आपकी अनचाही 'पुराने ढर्रे की' सलाह की। बच्चे बड़े होकर अपने संसार में रम चुके होते हैं। ऊपर से, जीवनसाथी की मौत हो चुकी हो तो जीवन का चौथापन एकांतवास में परिवर्तित होने में देर नहीं लगती। हालात से उपजी चिड़चिड़ाहट और खीज पुराने साथियों से भी दूर कर देती है। 'समझदार बुजुर्ग' अपने को घर के बाहर मंदिर के कीर्तन-भजन में झोंक देते हैं। प्रैक्टिकल वरिष्ठ नागरिक बच्चों को संभालने से लेकर सब्जी लाने तक की घर की अनचाही ड्यूटी पकड़ लेते हैं। किसी पार्क में नजर घुमाएं। जिंदगी की जिजीविषा लिए लकड़ी पकड़े हांफते हुए धीमे मगर सधे कदमों से स्वस्थ जीवन की कामना में आगे बढ़ते हुए सीनियर सिटीजन दिखेंगे। वहीं दूसरी तरफ, संसार के बेगानेपन से थके, वीरानगी में डूबे, बेजान आंखों और कड़वाहट भरी झुर्रियों का बोझ उठाए निढाल- गुमसुम चेहरे भी दिखाई दे जाएंगे।

बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं की बदौलत लोग ज्यादा जी रहे हैं। वो बुजुर्ग इंसान अगर मानता है कि वह शरीर और दिमाग, दोनों से चुस्त-दुरुस्त है, तो वह तथ्य को साबित करने के लिए दूसरे रास्ते तलाशता है। राजनीति की मक्कारी और झूठ झेलना आसान काम नहीं होता। वह सामाजिक संस्थाओं में जाता है तो वहां भी फुल टाइम फ्री सेवाओं की बजाए उसके दिए दान से ही उसका आकलन होता है। लॉफिंग क्लब, योगा सेंटरों में भी बड़े-बूढ़ों के अपने ग्रुप या 'क्लिक' बन चुके होते हैं, जिनसे मेल बनाए रखने की शर्तें व्यक्ति को आत्मसम्मान से समझौता लगने लगती हैं। नई पीढ़ी चाहे जितनी ही मॉर्डन क्यों न हो, अपने बुजुर्गों से सामाजिक मर्यादाओं के पालन की अपेक्षा रखती है। ये सत्य है कि समय के साथ सामाजिक आचरण और मर्यादाओं की सीमाएं बदलती हैं। पाप-पुण्य नापने के सामाजिक पैमाने भी युग के अनुरूप बदलते रहे हैं। बाल विवाह, सती प्रथा, विधवा विवाह, दहेज प्रणाली को सामाजिक मान्यता मिली हुई थी। आज ये सामाजिक दोष माने जाते हैं।

बुजुर्गों का एक वर्ग आज पारिवारिक वर्जनाओं को धता बताकर अपने तरीके से जीवन जीने के तरीके तलाश रहा है। क्या इन घटनाओं को विकृति मानकर नजरअंदाज कर दिया जाए या फिर समाज को बुजुर्गों के अस्तित्व, उनकी संवेदनशीलता को समाहित करने वाले नए मानदंडों पर दोबारा विचार करने की जरूरत है?

नेताओं पर कब-कब चले गुस्से के थप्पड़, नफरत के जूते


नई दिल्ली. अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जार्ज बुश पर चले नफरत के जूते का जो सिलसिला शुरू हुआ था, वह आज केंद्रीय मंत्री शरद पवार पर गुस्से के थप्पड़ पर आ गया है। हिंदुस्तान के अलावा दुनिया के कई देशों में कभी नेताओं को जूता तो कभी थप्पड़ जड़ा गया है। एक इराकी पत्रकार मुंतजर अल जैदी ने तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश पर 2008 में जूता फेंका था। इसके अलावा, गृहमंत्री पी चिदंबरम, पाकिस्तान राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी और चीनी राष्ट्रपति वेन जियाबाओ पर भी जूते फेंके जा चुके हैं।

बुश पर जब फेंका गया था जूता

जूता संस्कृति की शुरुआत दुनिया के सबसे ताकतवर राष्ट्रपति जॉर्ज बुश से हुई। इस समय अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा हैं, लेकिन जूता पड़ते वक्त जॉर्ज बुश राष्ट्रपति थे। उनके कार्यकाल का अंतिम दौर था। वो बगदाद दौरे पर गए थे।

आडवाणी पर जब चली चप्पल

मध्यप्रदेश में अप्रैल २क्क्९ में जब एनडीए की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार लालकृष्ण आडवाणी दौरे पर थे, तब उन पर चप्पल चल गई थी। घटना मध्य प्रदेश के कटनी में हुई थी। उस वक्त आडवाणी एक सभा को संबोधित कर रहे थे। उन पर चप्पल फेंकना वाला भाजपा का ही कार्यकर्ता पावस अग्रवाल था।

पी चिदंबरम पर भी उछला था जूता

गृह मंत्री पी चिदंबरम की प्रेस कॉन्फ्रेस में एक पत्रकार ने उन पर जूता उछाल दिया। उस वक्त चिदंबर जगदीश टाइटलर को सीबीआई की ओर से क्लीन चिट दिए जाने पर बोल रहे थे। ये पत्रकार उनसे संतुष्ट नहीं हुआ और विरोध करते हुए उनके ऊपर जूता फेंक दिया।

अरविंद केजरीवाल पर हमला

पिछले दिनों जब टीम अन्ना के सबसे सक्रिय सदस्य अरविंद केजरीवाल लखनऊ में कांग्रेस के खिलाफ एक सभा को संबोधित करने पहुंचे तो उस वक्त एक युवक ने उन पर हमला कर दिया। हालांकि, केजरीवाल को लगी तो नहीं, लेकिन उस युवक की काफी पिटाई हो गई। बाद में केजरीवाल ने इस युवक को माफ कर दिया।

प्रशांत भूषण की हुई पिटाई

कश्मीर के विवादित बयान के बाद टीम अन्ना के सदस्य को उनके दफ्तर में ही घुसकर भगत सिंह क्रांति सेना के कुछ युवकों ने पिटाई कर दी। ये युवक कश्मीर को अलग देश का दर्जा दिए जाने की राय पर काफी नाराज थे। वहीं, इस घटना के बाद भी भूषण अपनी बात पर जमे रहे।

सुखराम की भी हुई पिटाई

पूर्व संचार मंत्री सुखराम पर कोर्ट परिसर में ही एक युवक ने हमले की कोशिश की थी। हमला उस वक्त हुआ, जब उन्हें घूस लेने के आरोप में पांच साल की कैद और चार लाख रुपये जुर्माने की सजा सुनाई जा रही थी। हमले के वक्त सुखराम फैसला सुनने के बाद कोर्ट रूम से बाहर निकल रहे थे। हरविंदर सिंह नाम के हमलावार के पास कोई हथियार नहीं था और उसने लात-घूंसों से ही सुखराम पर हमले की कोशिश की थी लेकिन जल्द ही उसे काबू कर लिया गया।

मनमोहन पर भी जूता

जूते की मार से प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी नहीं बच पाए हैं। प्रधानमंत्री पर उस समय रैली को संबोधित कर रहे थे। जूता प्रधानमंत्री के मंच से कुछ दूरी पर गिरा। इस घटना के बाद भी प्रधानमंत्री भाषण देते रहे। हितेश चौहान नामक युवक ने यह जूता फेंका था।

जर्नादन द्विवेदी पर भी चला जूता

कांग्रेसी नेता जर्नादन द्विवेदी पर एक पत्रकार ने जूता मारने की कोशिश की थी। उस वक्त द्विवेदी कांग्रेस मुख्यालय पर आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेस में मीडिया को संबोधित कर रहे थे। पत्रकारों से बातचीत के दौरान द्विवेदी से एक सवाल किया गया जवाब मिलने के बावजूद यह पत्रकार जूता लेकर मंच पर चढ़ गया और द्विवेदी को मारने की कोशिश की। इस पत्रकार की पहचान झुंझून राजस्थान दैनिक नवसंचार के संवाददाता के रूप में की गई है। बाद में पुलिस के हवाले कर दिया गया।

कलमाड़ी भी खा चुके हैं चप्पल

इसी साल अप्रैल में कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाले मामले में गिरफ्तार ऑर्गनाइजिंग कमिटी के पूर्व अध्यक्ष सुरेश कलमाड़ी पर सीबीआई कोर्ट के बाहर चप्पल फेंकी गई थी। हालांकि वह कलमाड़ी को लगी नहीं। कलमाड़ी पर जब चप्पल फेंकी गई, तब उन्हें सीबीआई कोर्ट में पेशी के लिए ले जाया जा रहा था। कपिल ठाकुर नामक शख्स ने उनपर चप्पल फेंकी थी।  कपिल मध्य प्रदेश के रहनेवाले हैं।

वरुण गांधी के काफिले पर भी जूते-चप्पल से हमला

भाजपा के सांसद वरुण गांधी के रैली में न आने से नाराज भाजपा कार्यकर्ताओं ने उनके काफिले पर जूते चप्पल फेंके और उन्हें काले झंडे दिखाए थे। घटना नवाबगंज तहसील की थी।